Tarachandi : भ्रष्टाचार को अक्सर आधुनिक प्रशासन की समस्या माना जाता है, लेकिन इतिहास में भी इसके उदाहरण मिलते हैं। बिहार के रोहतास जिले के सासाराम स्थित मां ताराचंडी धाम में मौजूद एक प्राचीन शिलालेख ऐसी ही घटना की जानकारी देता है। 12वीं सदी के इस अभिलेख में कथित तौर पर रिश्वत देकर जाली ताम्रपत्र हासिल करने और दो गांवों पर अधिकार जताने का उल्लेख किया गया है।
यह शिलालेख तत्कालीन शासक महानायक प्रताप धवल देव से संबंधित है। इसमें एक ऐसे दस्तावेज का जिक्र है, जिसे राजा विजयचंद्र के नाम से जारी बताया गया था, लेकिन बाद में उसे फर्जी करार दिया गया। यह ऐतिहासिक विवरण दिखाता है कि उस दौर में भी सरकारी अधिकारों और भूमि से जुड़े मामलों में धोखाधड़ी की समस्या सामने आती थी।
Tarachandi : कहां मौजूद है ताराचंडी शिलालेख?
यह ऐतिहासिक अभिलेख बिहार के रोहतास जिले के सासाराम में स्थित मां ताराचंडी धाम के पास मौजूद है। बिहार सरकार के रोहतास जिला प्रशासन की वेबसाइट के अनुसार, मंदिर कैमूर पहाड़ी की प्राकृतिक गुफा में स्थित है। देवी की प्रतिमा के निकट 12वीं सदी के शासक महानायक प्रताप धवल देव से संबंधित शिलालेख भी मौजूद है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पटना सर्किल ने भी ताराचंडी मंदिर के निकट स्थित तीन शैल अभिलेखों का उल्लेख किया है। इनमें एक अभिलेख में जपिला के नायक प्रताप धवल देव का नाम मिलता है।
यह अभिलेख केवल धार्मिक स्थल के इतिहास को समझने में ही नहीं, बल्कि उस समय की प्रशासनिक व्यवस्था और सामाजिक परिस्थितियों के अध्ययन में भी उपयोगी है।
Tarachandi : रिश्वत देकर दो गांवों का अधिकार हासिल करने का मामला
ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, सुवर्णहल नामक गांव के कुछ लोगों ने तत्कालीन शासक के एक अधिकारी को कथित तौर पर रिश्वत देकर ताम्रपत्र हासिल किया था। इस दस्तावेज के माध्यम से किरहंडी और बरैला नामक दो गांवों पर अधिकार जताने की कोशिश की गई थी।
बताया जाता है कि ताम्रपत्र को राजा विजयचंद्र के नाम से जारी किया गया था। बाद में महानायक प्रताप धवल देव को इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने दस्तावेज को अमान्य बताया और अपने वंशजों को उस पर भरोसा नहीं करने का निर्देश दिया।
इस घटना में भूमि पर अधिकार प्राप्त करने के लिए कथित रिश्वत और दस्तावेजी जालसाजी का उल्लेख मिलता है। हालांकि, प्राचीन अभिलेख की भाषा और उसमें प्रयुक्त स्थानों के नामों की व्याख्या करते समय ऐतिहासिक संदर्भों का ध्यान रखना जरूरी है।
Tarachandi : कौन थे महानायक प्रताप धवल देव?
महानायक प्रताप धवल देव मध्यकालीन बिहार के इतिहास से जुड़े एक शासक थे। उनका संबंध जपिला क्षेत्र से बताया जाता है। उनके नाम से जुड़े अभिलेख उस समय की राजनीतिक व्यवस्था, प्रशासन और स्थानीय शासन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं।
ताराचंडी शिलालेख में उन्होंने अपने पुत्रों, पौत्रों और अन्य वंशजों को संबोधित करते हुए विवादित ताम्रपत्र को स्वीकार न करने की बात कही थी। इसका उद्देश्य संबंधित गांवों पर अधिकार और राजस्व प्राप्त करने के मामले में भविष्य के लिए निर्देश देना था।
अभिलेख का ऐतिहासिक महत्व इस बात में है कि यह केवल किसी धार्मिक स्थल या शासक की जानकारी नहीं देता, बल्कि तत्कालीन प्रशासन में कथित अनियमितता का भी विवरण सामने लाता है।
Tarachandi : ताम्रपत्र और शिलालेख में क्या अंतर है?
इस घटना को समझने के लिए ताम्रपत्र और शिलालेख के बीच अंतर जानना जरूरी है।
ताम्रपत्र तांबे की पट्टी पर लिखा गया दस्तावेज होता था। पुराने समय में इसका इस्तेमाल भूमि दान, अधिकारों की घोषणा और राजकीय आदेश दर्ज करने के लिए किया जाता था।
वहीं, शिलालेख पत्थर या चट्टान पर खुदवाया गया अभिलेख होता है। इसे लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाले ऐतिहासिक रिकॉर्ड के रूप में इस्तेमाल किया जाता था।
ताराचंडी से जुड़े इस मामले में कथित रूप से फर्जी ताम्रपत्र के जरिए दो गांवों पर अधिकार जताया गया था। इसके जवाब में प्रताप धवल देव के शिलालेख में उस दस्तावेज को अमान्य मानने का निर्देश दर्ज किया गया।
Tarachandi : क्या यह भारत में रिश्वतखोरी का पहला प्रमाण है?
ताराचंडी शिलालेख को प्राचीन भारत में रिश्वतखोरी के उल्लेख वाले महत्वपूर्ण अभिलेखों में गिना जा सकता है। इसमें रिश्वत, कथित जालसाजी और भूमि अधिकारों से जुड़े विवाद का विवरण मिलता है।
हालांकि, इसे पूरे भारत में रिश्वतखोरी का पहला प्रमाण कहना ऐतिहासिक रूप से सावधानी मांगता है। किसी एक अभिलेख के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि इससे पहले रिश्वतखोरी का कोई उल्लेख मौजूद नहीं था।
इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए ऐसे अभिलेख उस समय की प्रशासनिक व्यवस्था, भ्रष्ट आचरण और शासकीय नियंत्रण को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
सासाराम के ताराचंडी धाम का प्राचीन शिलालेख बिहार की ऐतिहासिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें रिश्वत देकर जाली ताम्रपत्र प्राप्त करने और दो गांवों पर अधिकार जताने के मामले का उल्लेख मिलता है। महानायक प्रताप धवल देव द्वारा उस दस्तावेज को अमान्य मानने का निर्देश इस घटना को और महत्वपूर्ण बनाता है।
यह अभिलेख याद दिलाता है कि भ्रष्ट आचरण और प्रशासनिक अनियमितताओं की समस्या का इतिहास काफी पुराना है। साथ ही, यह भी स्पष्ट करता है कि प्राचीन दस्तावेजों का अध्ययन तथ्यों और ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर किया जाना चाहिए।
स्रोत: बिहार सरकार, रोहतास जिला प्रशासन; भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, पटना सर्किल; उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेख संबंधी संदर्भ।
