MP Corruption Reality : भोपाल, मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी को लेकर अक्सर अलग-अलग दावे किए जाते हैं। कभी राज्य को देश के सबसे भ्रष्ट राज्यों में शामिल बताया जाता है, तो कभी सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई के आंकड़ों को आधार बनाकर रैंकिंग पेश की जाती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े वास्तव में मध्य प्रदेश को देश का छठा या दसवां सबसे भ्रष्ट राज्य साबित करते हैं? इस आर्टिकल में विस्तार से जानिए, उन तथ्यों को जिनमें कई झोल हैं।

उपलब्ध रिपोर्टों की पड़ताल बताती है कि भ्रष्टाचार की स्थिति समझने के लिए दर्ज मुकदमों, रिश्वतखोरी के नागरिक अनुभवों और भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियों की कार्रवाई को अलग-अलग देखना जरूरी है।

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MP Corruption Reality : NCRB की रिपोर्ट क्या बताती है?

NCRB की Crime in India 2023 रिपोर्ट में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज मामलों और भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियों की कार्रवाई से संबंधित राज्यवार आंकड़े शामिल हैं। सरकारी ओपन डेटा पोर्टल पर इस रिपोर्ट से जुड़े आंकड़े उपलब्ध हैं। हालांकि, केवल मामलों की संख्या के आधार पर किसी राज्य को सबसे भ्रष्ट घोषित करना उचित नहीं है। ज्यादा मामले दर्ज होने का अर्थ यह भी हो सकता है कि शिकायतों पर कार्रवाई हुई, जांच एजेंसियां सक्रिय रहीं या भ्रष्टाचार के मामले सामने लाए गए। इसके विपरीत, कम मामले दर्ज होना अपने आप में भ्रष्टाचार कम होने का प्रमाण नहीं है।

MP Corruption Reality

इसलिए मध्य प्रदेश को महाराष्ट्र और राजस्थान के बाद भ्रष्टाचार में तीसरे स्थान पर बताने या ट्रैप मामलों में देश के शीर्ष राज्यों में गिनने से पहले संबंधित वर्ष की आधिकारिक तालिका और समान मापदंडों पर आधारित तुलना जरूरी है। उपलब्ध स्रोतों से राज्य की छठी या दसवीं रैंकिंग की स्वतंत्र पुष्टि नहीं होती।

MP Corruption Reality : 2019 के सर्वे में मध्य प्रदेश के 55 प्रतिशत लोगों ने क्या कहा?

भ्रष्टाचार के नागरिक अनुभवों को समझने के लिए LocalCircles और Transparency International India का India Corruption Survey 2019 महत्वपूर्ण संदर्भ है।

इस सर्वे के मध्य प्रदेश संबंधी नतीजों के अनुसार, सर्वे में भाग लेने वाले 55 प्रतिशत लोगों ने बताया था कि पिछले 12 महीनों में उन्हें अपना काम कराने के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से रिश्वत देनी पड़ी। इनमें 22 प्रतिशत ने कई बार और 33 प्रतिशत ने एक या दो बार रिश्वत देने की बात कही। वहीं, 12 प्रतिशत ने बिना रिश्वत काम होने और 33 प्रतिशत ने ऐसी जरूरत नहीं पड़ने की जानकारी दी।

यह आंकड़ा नागरिकों के अनुभवों के लिहाज से चिंता पैदा करता है। लेकिन ध्यान रहे कि यह 2019 का सर्वे है। इसे 2026 की स्थिति बताना या इससे सीधे राज्य की मौजूदा राष्ट्रीय रैंकिंग निर्धारित करना सही नहीं होगा।

MP Corruption Reality : किन सरकारी सेवाओं में सामने आई थीं शिकायतें?

उसी सर्वे में मध्य प्रदेश के उत्तरदाताओं ने संपत्ति पंजीयन, जमीन से जुड़े काम और नगर निगम जैसी सेवाओं में रिश्वत देने के अनुभव बताए थे। रिपोर्ट के अनुसार, रिश्वत देने की बात स्वीकार करने वाले उत्तरदाताओं में 38 प्रतिशत ने नगर निगम और 37 प्रतिशत ने संपत्ति पंजीयन एवं भूमि संबंधी मामलों का उल्लेख किया। शेष 25 प्रतिशत ने अन्य सेवाओं का जिक्र किया।

इन निष्कर्षों को पूरे राज्य के हर विभाग पर लागू नहीं किया जा सकता। फिर भी ये संकेत देते हैं कि नागरिक सेवाओं में पारदर्शिता, समयबद्ध निपटान और शिकायतों पर कार्रवाई मजबूत करना जरूरी है।

MP Corruption Reality : क्या ट्रैप केस भ्रष्टाचार की पूरी तस्वीर दिखाते हैं?

ट्रैप कार्रवाई में किसी सरकारी कर्मचारी को कथित तौर पर रिश्वत लेते हुए पकड़ा जाता है। ऐसे मामलों के आंकड़े भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियों की गतिविधियों का महत्वपूर्ण संकेत हैं, लेकिन वे भ्रष्टाचार की कुल व्यापकता नहीं बताते।

किसी राज्य की सही स्थिति जानने के लिए दर्ज मामलों के साथ-साथ जांच पूरी होने, आरोपपत्र दाखिल होने, अदालत में दोषसिद्धि, लंबित मामलों और शिकायतों के निपटारे की स्थिति भी देखनी चाहिए। इसके अतिरिक्त, राज्यों की आबादी और प्रशासनिक व्यवस्था में अंतर को ध्यान में रखना आवश्यक है।

MP Corruption Reality : रैंकिंग से ज्यादा जरूरी जवाबदेही

उपलब्ध प्रमाण यह बताते हैं कि मध्य प्रदेश में रिश्वतखोरी को लेकर गंभीर नागरिक अनुभव सामने आए हैं। लेकिन राज्य को देश का छठा, दसवां या तीसरा सबसे भ्रष्ट राज्य घोषित करने के लिए एक स्पष्ट, वर्ष-विशिष्ट और तुलनीय आधिकारिक आधार जरूरी है। फिलहाल उपलब्ध 2019 के सर्वे को वर्तमान रैंकिंग और NCRB के दर्ज मामलों को भ्रष्टाचार की वास्तविक व्यापकता का सीधा पैमाना नहीं माना जाना चाहिए।

भ्रष्टाचार पर प्रभावी नियंत्रण के लिए सरकारी सेवाओं का डिजिटलीकरण, पारदर्शी प्रक्रिया, शिकायतकर्ताओं की सुरक्षा, समयबद्ध जांच और दोषियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई जरूरी है। असली कसौटी सिर्फ यह नहीं कि कितने मामले दर्ज हुए, बल्कि यह भी है कि आम नागरिक को बिना रिश्वत दिए उसका जायज काम कितनी आसानी से और कितने समय में मिलता है।

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